अंत में अकेली मैं थी खड़ी

अंत में अकेली मैं थी खड़ी

अंत में अकेली मैं थी खड़ी

अंत में अकेली मैं थी खड़ी…
बेटा-बेटी, पोता-पोती
और नातियों के बीच एक मैं भी खड़ी
पर अफ़सोस तुम्हें कभी न दिखी
बहु और बेटियों नें फर्क रखा
तुमने हमेशा बड़ा
झोली तुम्हारी हमेशा मैंने भरी
और आगे तुमनें उनकी भरी
अंत में अकेली मैं ही थी खड़ी|

माँ-बहन की गुहार
तुमने हमेशा ही सुनी… पर मेरी
तुमने कभी एक भी न सुनी
सालों बीत जाते एक तोहफा न
नसीब होता यहाँ, पर एक फरमाइश
पर तुमनें उनकी लुटा दी तमन्ना मेरी
मुश्किल के हर पल में तुम्हारे संग थी मै खड़ी
अंत में अकेली मैं ही थी खड़ी|

कभी लगते अपने से, कभी बेगाने तुम
जाने फिर भी क्यूँ
साथ तुम्हारा मैं निभाती चली
तुम्हारी हर ज़रुरत, हर ख्वाइश पर जान लुटाती चली
बोल कर देखा, माँग कर भी देखा
पर मेरे लिए तुम्हारे पास वक्त ही नहीं
कभी पैसा तो कभी वक्त की हरदम कमी रही
अंत में अकेली मैं ही थी खड़ी|

थक गयी हूँ… कभी पत्नी, कभी बहु
कभी भाभी, कभी माँ बनकर
सबकी ज़रूरतें पूरी करते करते
अब, खुद को ही कहीं भूल चली…
एक काम करना अगर कर सको तुम
मेरी अर्थी पर एक तोहफा रख देना तुम
मरणोपरांत तो न मैं यह कह न सकूँ
अंत में अकेली मैं ही थी खड़ी
अंत में अकेली मैं ही थी खड़ी…

टिप्पणी

ज्यादातर परिवारों में, बेटियों और बेटियों और बहुओं  के लिए स्वतंत्रता के लिए अलग-अलग मापदंड होते हैं | रिश्ते निभाते निभाते वो खुद को भूल जाती है| मेरी इस कविता ‘अंत में अकेली मैं था खड़ी’ का उद्देश्य एक बहू के दर्द और दुविधा को उजागर करना जो परिवार के लिए सब कुछ करती है लेकिन फिर भी परिवार में खुद को अकेले खड़ा पाती है। चाहे बात उसके सम्मान की हो, तोहफे की हो, काम की हो या फिर कपडे पहनने की आज़ादी की हो|

~o~

ant mein akelee main thee khadee

ant mein akelee main thee khadee…
beta-betee, pota-potee
aur naatiyon ke beech ek main bhee khadee
par afasos tumhen kabhee na dikhee
bahu aur betiyon nen phark rakha
tumane hamesha bada
jholee tumhaaree hamesha mainne bharee
aur aage tumanen unakee bharee
ant mein akelee main hi thee khadee

maan-bahan kee guhaar
tumane hamesha hi sunee… par meree
tumane kabhee ek bhee na sunee
saalon beet jaate ek tohapha na
naseeb hota yahaan, par ek pharamaish
par tumanen unakee luta dee tamanna meree
mushkil ke har pal mein tumhaare sang thee mai khadee
ant mein akelee main hi thee khadee

kabhee lagate apane se, kabhee begaane tum
jaane phir bhee kyoon
saath tumhaara main nibhaatee chalee
tumhaaree har zarurat, har khavaish
par jaan lutaatee chalee
bol kar dekha, maang kar bhee dekha
par mere lie tumhaare paas vakt hi nahin
kabhee paisa to kabhee vakt kee haradam kamee rahee
ant mein akelee main hi thee khadee

thak gayee hoon… kabhee patnee, kabhee bahu
kabhee bhaabhee, kabhee maan banakar
sabakee zarooraten pooree karate karate
ab, khud ko hi kaheen bhool chalee…
ek kaam karana agar kar sako tum
meree arthee par ek tohapha rakh dena tum
maranoparaant to na main yah kah na sakoon
ant mein akelee main hi thee khadee
ant mein akelee main hi thee khadee…

Note

Mostly in families, there is the different yardstick of measurement for freedom for daughters and daughters-in-law. My this poem ‘अंत में अकेली मैं थी खड़ी’ aims to highlight the pain and dilemma of a daughter-in-law who does everything for the family but still stands alone in the family.

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

18 Comments

  1. बहुत दर्द भरी कविता हैं यह मन को अंदर तक छू गयी

  2. Ranjeeta….very nicely depicted the destiny of a woman in our society…… It is actually happening…….After reading it I am actually thinking myself in that situation….🙏🙏

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