अतिथि Post: Ranjeeta Ashesh-मैं खुद से खुद को जोड़ आई

मै खुद से खुद को जोड़ आई

मैं खुद से खुद को जोड़ आई

बेपरवाह, बेसुध सा समन्दर मस्ताए,
अपने खारेपन पर देखो कितना इतराए,
उसकी भीगी रेत पर मै पैरों के निशां छोड़ आई,
मैं खुद से खुद को जोड़ आई।

उन्मुक्त गगन को, कैसे घूरता जाए,
जुनून से किनारे पर हड़कम्प मचाए,
देख रंगत उसकी,मै संकोच का शीशा तोड़ आई ,
मैं खुद से खुद को जोड़ आई ।

तकते रहते चाँद सूरज,उसको कौन समझाए,
अपनी धुन मे मलंग,वो बहकर निकल जाए,
उसकी हर हलचल की ओर रूख मोड़ आई,
मैं खुद से खुद को जोड़ आई ।

© रंजीता अशेष

 

mai khud se khud ko jod aaee

beparavaah,besudh sa samandar mastae,
apane khaarepan par dekho kitana itarae,
usakee bheegee ret par mai pairon ke nishaan chhod aaee,
mai khud se khud ko jod aaee.

unmukt gagan ko, kaise ghoorata jae,
junoon se kinaare par hadakamp machae,
dekh rangat usakee,mai sankoch ka sheesha tod aaee ,
mai khud se khud ko jod aaee .

takate rahate chaand sooraj,usako kaun samajhae,
apanee dhun me malang,vo bahakar nikal jae,
usakee har halachal kee or rookh mod aaee,
mai khud se khud ko jod aaee .

© ranjeeta ashesh

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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