अतिथि Post: Rishika Ghai-हिंदी का बहिष्कार क्यों?

हिंदी का बहिष्कार क्यों

हिंदी का बहिष्कार क्यों?

हिंदी से सरल कोई
भाषा नही फिर भी
झिझक होती है बोलने में इतनी
न जाने ऐसे क्यों होता है?

मातृभाषा होते हुए भी नकारी जाती है
और अंग्रजी को बड़ावा मिलता है
देशवासी भूल जाते है अक्सर
की राष्ट्रभाषा हिंदी हि सब भाषाओं का मिश्रण है|

“हिंदी बोलने से हमारा औदा गिर जायेगा”
हमारी युवा एवं किशोर पीढ़ियों की सोच ही कुछ निराली है
न जाने क्यों हिंदी भाषा पर गर्वित होने के बजाय
उन्हें अंग्रेजी इतनी क्यूँ भाती है|

अंग्रेजी में पढाई करने वाले, अंग्रेजी में नौकरी करने वाले,
लोकप्रिय और दिग्गज लेखक और साहित्यकार मिलते हैं
किन्तु जब लिखने के लिए कलम उठाई उन्होंने तो उन्हें भी
जन जन में बोली व समझी जाने वाली हिंदी ही याद आई |

न केवल आज़ादी के आन्दोलन की भाषा थी हिंदी
अपितु हमारी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा, हमारा मान-सम्मान थी हिंदी
हमारी संस्कृति, संस्कार, हमारा समुदाय थी हिंदी
लेकिन आज़ादी के उपरांत सत्तालोलुपता और भाषाई राजनीति
की भेंट चढ़ गई हमारी हिंदी|

–ॠषिका घई सृजन

 

hindi ka bahishkaar kyon?

hindi se saral koee
bhaasha nahee phir bhee
jhijhak hotee hai bolane mein itanee
na jaane aise kyon hota hai?

maatrbhaasha hote hue bhee nakaaree jaatee hai
aur angrajee ko badaava milata hai
deshavaasee bhool jaate hai aksar
kee raashtrabhaasha hindi hi sab bhaashaon ka mishran hai

“hindi bolane se hamaara auda gir jaayega”
hamaaree yuva evan kishor peedhiyon kee soch hee kuchh niraalee hai
na jaane kyon hindi bhaasha par garvit hone ke bajaay
unhen angrejee itanee kyoon bhaatee hai

angrejee mein padhaee karane vaale, angrejee mein naukaree karane vaale,
lokapriy aur diggaj lekhak aur saahityakaar milate hain
kintu jab likhane ke lie kalam uthaee unhonne to unhen bhee
jan jan mein bolee va samajhee jaane vaalee hindi hee yaad aaee

na keval aazaadee ke aandolan kee bhaasha thee hindi
apitu hamaaree maatrbhaasha, raashtrabhaasha, hamaara maan-sammaan thee hindi
hamaaree sanskrti, sanskaar, hamaara samudaay thee hindi
lekin aazaadee ke uparaant sattaalolupata aur bhaashaee raajaneeti
kee bhent chadh gaee hamaaree hindi

–rishika ghai srijan

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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