आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ

आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ

-रंजीता नाथ घई

आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ…

आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ 
जब रखा था पहला कदम मैंने इस देहलीज़ पर…..
मन में डर और एक अजीब  सी बेचैनी थी,
नए थे गलियारे और नयी सी दीवारें थी, 
थम सी जाती थी हँसी और कशमकश से जूझती थी,
फिर दिखी एक सुनहरी किरन, इंद्रधनुष से रंग बिखेरती किरन,
आत्मविश्वास जगाती एक किरन, तूफानों को थामती हुई किरन,
भविष्य की आहट पहचान, आगे बढऩे का हौसला देती वो किरन,
आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ 
जब रखा था पहला कदम मैंने इस देहलीज़ पर…..

****

कौन पकड़ पाया है रिशतों को और रेत को,   
जितना समेटना चाहा उतना ही हाथों से सरकती गई, 
हाथ कल भी खाली थे और आज भी खाली है,
बीते कल के पास न कहने को कुछ नया है,
न इसके पास तुझे देने को कुछ नया है,
कुछ है तो बस एक मीठा सा ऐहसास है,
एक प्यारी सी मुसकान है, एक अपनेपन का आगास है, 
आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ 
जब रखा था पहला कदम मैंने इस देहलीज़ पर…..

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तूने किया वो सब जो तेरे बस में था,
उसी बंधन से मुक्त हो आगे बढ़ने का समय आया है,
पल-पल, क्षण-क्षण, नई उडान भरते हुए 
नए गीत गाने हैं, तसवीर में नए रंग भरने हैं,
सप्त चक्र के जीवन में सुमधुर यादें बटोरने का,
कुछ अपनो से विदा लेने का, कुछ नए रिश्ते जोड़ने का वक्त आया है,
आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ 
जब रखा था पहला कदम मैंने इस देहलीज़ पर…..

—–XxXxX—–

aaj phir us mod par mudana hua…

aaj phir us mod par mudana hua
jab rakha tha pahala kadam mujhe yah dehaleez par…..
man mein dar aur ek ajeeb see bechainee tha,
naee gaaliyaare aur naee see deevaaron mein,
tham see jaati hansee aur kashamakash se joojhatee thee,
phir dikhee ek sunaharee kiraan, indaara dhanush se rang vikheretee kiraan,
aatmavishvaas jaagatee ek kiran, toophaanon ko thamit huee kiron,
bhavishy kee aahat pahachaan, aage badhane ke haus diya vo kiran,
aaj phir us mod par mudana hua
jab rakha tha pahala kadam mujhe yah dehaleez par…..

****

kaun see dharatee paaya hai, jis par aur ret ko,
jitana samatena chaaha utana hee haathon se sarakate hue,
haath kal bhee khaalee hain aur aaj bhee khaalee hai,
beete kal ke paas na kahane ko kuchh naya hai,
nahin, usake paas aap ko kuchh naya hai,
kuchh to bas ek meetha sa ihasaas hai,
ek pyaaree see musakaan hai, ek aapan kee agos hai,
aaj phir us mod par mudana hua
jab rakha tha pahala kadam mujhe yah dehaleez par…..

****

toone kiya vo sab jo tere bas mein tha,
vah bandhan se mukt ho aage badhane ka samay aaya hai,
pal-pal, kshan-kshan, naya udaan bharate hue
nae geet gaane hain, tasaveer mein nae rang bharane hain,
sapt chakr ke jeevan mein sudhur yaaden bularane ka,
kuchh apano se vida lene kee, kuchh naee sambandhon ko jodane ka vakt aaya hai,
aaj phir us mod par mudana hua
jab rakha tha pahala kadam mujhe yah dehaleez par…..

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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