कुछ बिखरी यादें, कुछ बिखरे पल

 कुछ बिखरी यादें, कुछ बिखरे पल

कुछ बिखरी यादें, कुछ बिखरे पल

मुट्ठी भर राख और
कुछ बिखरी यादें रह जाती हैं
जो रह रह कर हमें आंसुओं में भिगो जाती हैं|

कागज़ की कश्ती, रेत के घरोंदे
बनाते बचपन बीता, बस यादों में
सिमट के रह गए मेरा बचपन के अफसाने|

हर बीता लम्हा
कभी ख़ुशी, कभी गम
तो कभी नासूर बन जाता है|

दिल डरने लगा है अब
यादों की आहट से, बस याद उनकी आती है,
और रुलाती चली जाती है|

वादा निभाना हमारी आदत, और, 
हमें भूलना उनकी आदत सी हो गई है 
तक़दीर भी अपना खेल दिखाती चली जा रही है|

—–XxXxX—–

kuchh bikharee yaaden, kuchh bikhare pal

mutthee bhar raakh aur
kuchh bikharee yaaden rah jaate hain
jo rahatee rah kar ham ansuon mein bhaga jaate hain

kaagaz kee kashtee, ret ke gharonde
banaate bachapan beeta, bas yaadon mein
simat ka rah gae mere bachapan ke aphasaane 

har beeta laam
kabhee khushee, kabhee gam
to kabhee naasoor banata hai

dil daraane laga ab hai
yaadon ka naatak se, bas yaad unakee aatee hai,
aur rulaatee chalee jaati hai

vaada nibhaana hamaare aadat, aur,
hamen bhoolana unake aadit see ho gaya hai
takadeer bhee apane khel ko dikhaatee hai chalee ja rahee hai

 

 

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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