मैं क्यों लिखती हूँ

मैं क्यों लिखती हूँ

श्याम से श्वेत तक कुछ रंगों की ,
बिखरी कथाओं को और,
कभी कुछ हार्दिक यादों को समेटती हूँ,
कभी आनंदित संतुलन के स्तर तक
आत्मा को ऊपर उठाने का प्रयास करती हूँ,
तो कभी मैं लिख कर
सुंदर अनुभव को परिभाषित करने का प्रयास करती हूँ,
इसीलिए मैं लिखती हूँ…

हो सकता है, यह अपने आप का एक विस्तार है,
तो हो सकता है, यह एक तरह से भीतर के राक्षस
को चुप करने का एक तुच्छ प्रयास है,
या फिर ये मन की सफाई का एक व्यायाम है
मेरी आँखें जो देखती हैं, निरीक्षण करती हैं,
मन जिस बात की व्याख्या करता है,
उन बातों को समझ कर, संजोती हूँ,
अपने घाव को शब्दों में पिरोती हुई खुद तो सांत्वना देती हूँ
इसीलिए मैं लिखती हूँ…

कभी मेरा क्रोध, तो कभी मेरा लहु
कविता के रूप में बहता है|
भावना, विचार, विश्वास, इच्छा का एक उदात्त संगम
खुशी और ज़िंदादिली की सीमाओं को परखता है|
कभी कभी आत्मविश्लेषी,
कभी कभी पूर्वव्यापी बनकर,
खुद को ही खोजने निकलती हूँ,
इसीलिए मैं लिखती हूँ… 

स्वयं की खोज को चरम सीमा तक पहुँचाती 
प्रेरणा का एक निरंतर स्रोत ढूँढती हूँ|
अनंत संभावनाओं और अंतहीन रोमांच
की एक नई दुनिया का निर्माण करती,
काली स्याही के धब्बों से उन्हें सजाती हूँ|
पुनः प्राप्ति; पुनराविष्कार की
एक श्रृंखला को आगे बढाती हूँ
इसीलिए मैं लिखती हूँ… 

–रंजीता नाथ घई सृजन

 

टिप्पणी

बहुत से लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि मैंने क्यों लिखा है… मैं क्यूँ लिखती हूँ | कुछ लोगों का मानना है कि यह समय और ऊर्जा की बर्बादी है। दूसरों को खुशी है कि मैं लिखती हूँ| वास्तव में यह मेरे सिस्टम को अंदर से नकारात्मक भावनाओं से मुक्त करने में और मानसिक संतुलन को बनाने में मदद करता है| खुद को शुद्ध करना में यह एक निराशाजनक विरोधी के रूप में कार्य करता है और परिस्थितियों से निपटने में  मेरी मदद करता है और सभी विषाक्तता को निकालता है।

 

Note

Many people have often asked me as to why I write. Some feel it is a waste of time and energy. Others feel happy that I write. Actually writing for me is to help my system purge itself of all negative emotions building up inside me. It acts as an anti depressant and removes all toxicity from my being helping me better to cope with the circumstances.

—–XxXxX—–

main kyon likhatee hoon

shyaam se shvet tak kuchh rangon kee ,
bikharee kathaon ko aur,
kabhee kuchh haardik yaadon ko sametatee hoon,
kabhee aanandit santulan ke star tak
aatma ko oopar uthaane ka prayaas karatee hoon,
to kabhee main likh kar
sundar anubhav ko paribhaashit karane ka prayaas karatee hoon,
iseelie main likhatee hoon…ho sakata hai, yah apane aap ka ek vistaar hai,
to ho sakata hai, yah ek tarah se bheetar ke raakshas
ko chup karane ka ek tuchchh prayaas hai,
ya phir ye man kee saphaee ka ek vyaayaam hai
meree aankhen jo dekhatee hain, nireekshan karatee hain,
man jis baat kee vyaakhya karata hai,
un baaton ko samajh kar, sanjotee hoon,
apane ghaav ko shabdon mein pirotee huee khud to saantvana detee hoon
iseelie main likhatee hoon…kabhee mera krodh, to kabhee mera lahu
kavita ke roop mein bahata hai|
bhaavana, vichaar, vishvaas, ichchha ka ek udaatt sangam
khushee aur zindaadilee kee seemaon ko parakhata hai|
kabhee kabhee aatmavishleshee,
kabhee kabhee poorvavyaapee banakar,
khud ko hee khojane nikalatee hoon,
iseelie main likhatee hoon…svayan kee khoj ko charam seema tak pahunchaatee
prerana ka ek nirantar srot dhoondhatee hoon|
anant sambhaavanaon aur antaheen romaanch
kee ek naee duniya ka nirmaan karatee,
kaalee syaahee ke dhabbon se unhen sajaatee hoon|
punah praapti; punaraavishkaar kee
ek shrrnkhala ko aage badhaatee hoon
iseelie main likhatee hoon…

–ranjeeta nath ghai srijan

tippanee

bahut se log mujhase aksar poochhate hain ki mainne kyon likha hai… main kyoon likhatee hoon | kuchh logon ka maanana hai ki yah samay aur oorja kee barbaadee hai. doosaron ko khushee hai ki main likhatee hoon| vaastav mein yah mere sistam ko andar se nakaaraatmak bhaavanaon se mukt karane mein aur maanasik santulan ko banaane mein madad karata hai| khud ko shuddh karana mein yah ek niraashaajanak virodhee ke roop mein kaary karata hai aur paristhitiyon se nipatane mein  meree madad karata hai aur sabhee vishaaktata ko nikaalata hai.

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

2 Comments

  1. This is so much relatable. I feel it is why most of us choose to write. Learnings, imaginations, whims and fancies and what not compel us to write and you have covered the heart and the own world of a writer so well.
    I loved this piece and your recitation!

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