लम्हें

लम्हें

रंजीता नाथ घई

लम्हें

शायद ही हम कोई ऐसा लम्हा जीए जाते हैं,
जो तुम्हारी याद से वाबस्ता ना हो,
दिल की धड़कन से साँसों तक की मंजिल में,
हर मोड़ पर हम, तुम्हारे ही अफसाने बसाए जाते हैं…

मेरी हर ख्वाइश, हर मुस्कराहट, और,
हर सपने पर, तुम्हारा ही इख्तियार हो,
हर लम्हा, हर कदम, हर मुश्किल में,
तुम्हारा ही हाथ थामें रहें, बस यही तमन्ना रखते हैं…

तुम्हारे सपनों को सजाते रहें, 
तुम्हारी हर मुश्किल को अपनाते रहें,
हर बेरुख़ी से बेगाने तेरी आँखों से पीते रहें,
सिर्फ इतनी सांसें मेरे रब्बा मुझे बक्श दे…

यूँ कहो मन की हर ख़ुशी, हर तमन्ना,
यह मुक़द्दर भी तुम्हारे नाम कर दें,
इस दीवानी की दीवानगी अभी तूने देखी नहीं,
इशारा तो कर, अपनी हर मुस्कान तेरे नाम कर दें…

मैखाने में भी वो कशिश नहीं,
जो तेरे आगोश में खुद को मिटा देने में है,
तेरे अंजुमन में खुद को भूल आई मैं,
अब तो खुद से ही बेगाने बने बैठे हैं…

शायद ही हम कोई ऐसा लम्हा जीए जाते हैं,
जो तुम्हारी याद से वाबस्ता ना हो,
दिल की धड़कन से साँसों तक की मंजिल में,
हर मोड़ पर हम, तुम्हारे ही अफसाने बसाए जाते हैं…

(5 अप्रैल 2015)

—–XxXxX—–

lamhen

shaayad hee ham koee aisa lamha jeee jaate hain,
jo tumhaaree yaad se vaabasta na ho,
dil kee dhadakan se saanson tak kee manjil mein,
har mod par ham, tumhaare hee aphasaane basae jaate hain…

meree har khvaish, har muskaraahat, aur,
har sapane par, tumhaara hee ikhtiyaar ho,
har lamha, har kadam, har mushkil mein,
tumhaara hee haath thaamen rahen, bas yahee tamanna rakhate hain…

tumhaare sapanon ko sajaate rahen,
tumhaaree har mushkil ko apanaate rahen,
har berukhee se begaane teree aankhon se peete rahen,
sirph itanee saansen mere rabba mujhe baksh de…

yoon kaho man kee har khushee, har tamanna,
yah muqaddar bhee tumhaare naam kar den,
is deevaanee kee deevaanagee abhee toone dekhee nahin,
ishaara to kar, apanee har muskaan tere naam kar den…

maikhaane mein bhee vo kashish nahin,
jo tere aagosh mein khud ko mita dene mein hai,
tere anjuman mein khud ko bhool aaee main,
ab to khud se hee begaane bane baithe hain…

shaayad hee ham koee aisa lamha jeee jaate hain,
jo tumhaaree yaad se vaabasta na ho,
dil kee dhadakan se saanson tak kee manjil mein,
har mod par ham, tumhaare hee aphasaane basae jaate hain…

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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