संकोच है किस बात का | जाना पहचाना लगता है

रिश्तों मे आई दरारों को भर लो
वरना रिश्तों को टूटने मे देर नही लगती।
ओर टूटी चीज़ें कभी नही जुड़ती ।
इन दरारों की गहराईयों को
संवादों के मरहम से भर दो।
अहं को परे रख रिश्तों को समेट लो
वरना इन्हें बिखरने मे देर नही लगती ।
संकोच किस बात का है
बिखरती ज़िन्दगी को यहीं रोक लो
वरना ज़िन्दगी उजड़ने मे देर नही लगती….
– Pratibha Ahuja Nagpal


अभिमान की खिड़की खोल कर मैने
स्वाभिमान का पर्दा डाला है
जीवन की इस गहराई को
कुछ पल में ही जाना है
आज मैंने हर बात पर हँसकर
हर गम को फटकारा है
किसकी फिक्र करू अब मैं
जब लोगो को पहचाना है
स्वार्थ पर टिके हर रिश्ते में
आत्मीयता को ही नही पाया हैं
कैसे कहूँ स्वाभिमान की आँच पर
मैंने खुद को तपाया है।
– Radha Shailendra


हर रिश्ते को मैंने प्यार से अपनाया
हर रिश्ते को मैंने दिल से निभाया
जब भी मैंने पलटकर देखा
हर रिश्ता मुझे जाना,पहचाना लगता है।
– Ankita Gupta


श्वेत बादल
तारों से भरा
ये आसमां…
खामोश रात
ये हवाओं का शोर
और ये अधूरा चांद
सब जाना पहचाना लगता हैं ..
पर तुम्हारे न होने से
सब कुछ अधूरा लगता है।
– Vandana Mandal


वायु, जल, अग्नि, धरा, अंबर पंचतत्व जब एक हुए,
बना गूढ़ मानव शरीर इनकी दिव्य ज्योति लिए।
जब प्रकृति के कण-कण से जीवन मिलता है,
फिर क्यों नहीं??
इसका सुख-दुख जाना पहचाना सा लगता है।
– Kavita Singh


एक चेहरा जाना पहचाना सा लगता है
नजरों में मोहब्बत की कशिश
लबों पर मासूम मुस्कुराहट
बालों में बिखरा हुआ पुर नूर सा साया
सौम्य शालीन व्यक्तित्व का स्वामी
हां ऐसा ही एक चेहरा जाना पहचाना सा
जन्मों से साथ है और साथ ही रहने वाला
बहुत अपना सा बहुत प्यारा सा लगता है
– Madhu Khare

Leave a Comment