सिसकियाँ

सिसकियाँ
– रंजीता नाथ घई 

सिसकियाँ

लिखना;
अब एक नशा सा बन गया है
जुबां जो बयाँ न कर सके
कलम भी बस अब
उसी मुद्दे पर कहर ढाती है|

~0~

कुछ लिखने से अगर
ज़िन्दगी के मसले सुलझ जाते
और तकलीफें ख़तम हो जाती
तो शायद आज हर एक शक्स 
के हाथ
में कलम और जुबां पे फ़साने होते|

~0~

आज मुद्दत के बाद कुछ लिखने बैठी
तो लगा की निकल पड़ेंगे उछल कर
सारे मेरे दिल के राज़… दामन में मेरे
हर ख़ुशी है बसती
पर एक नहीं है तो बस तेरा साथ|

~0~

ये वक़्त की बंदिश है,
मेरी तकदीर या किस्मत का खेल है
की बनती बात बिगड़ जाती है
कुछ इस तरह से अपनों से जुदा हुए हैं की
शब्दों में भटकती आज भी मेरी आत्मा है|

—–XxXxX—–

sisakiyaan

likhana;
ab ek nasha sa ban gaya hai
jubaan jo bayaan na kar sake
kalam bhee bas ab
usee mudde par kahar dhaatee hai|

~0~

kuchh likhane se agar
zindagee ke masale sulajh jaate
aur takaleephen khatam ho jaatee
to shaayad aaj har ek shaks haath
ke mein kalam aur jubaan pe fasaane hote|

~0~

aaj muddat ke baad kuchh likhane baithee
to laga kee nikal padenge uchhal kar
saare mere dil ke raaz… daaman mein mere
har khushee hai basatee
par ek nahin hai to bas tera saath|

~0~

ye vaqt kee bandish hai,
meree takadeer ya kismat ka khel
ke banatee baat bigad jaatee hai
kuchh is tarah se apanon se juda hue
ke shabdon mein bhatakatee aaj bhee meree aatma hai|

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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