humein ruthon ko manana na aaya | हमें रुठों को मनाना ना आया

humein ruthon ko manana na aaya हमें रुठों को मनाना ना आया

humein ruthon ko manana na aaya | हमें रुठों को मनाना ना आया

हमें रुठों को मनाना ना आया,
बिगड़ी बात सवारना न आया,
न करीब आ पाए न दूर जाना आया,
रुलाया बस….किसी को हसाना ना आया,
हमें रुठों को मनाना ना आया….
खुश रहकर भी खुशियाँ बांटना न आया,
मोहब्बत भी की तो निभाना न आया,
रुसवाई के डर से कुछ पल साथ बैठना न आया,
हमें रुठों को मनाना ना आया….
न दोस्ती निभानी आई,
न नज़रें झुका पाई,
कुछ यूँ बयाँ हुआ हाल ए दिल का फसाना.
हमें…..
हमें तो आज भी रुठों को मनाना ना आया….

~0~

humein ruthon ko manana na aaya

humein ruthon ko manana na aaya,
bigadee baat savaarana na aaya,
na kareeb aa pae na door jaana aaya,
rulaaya bas….kisee ko hasaana na aaya,
humein ruthon ko manana na aaya….
khush rahakar bhee khushiyaan baantana na aaya,
mohabbat bhee kee to nibhaana na aaya,
rusavaee ke dar se kuchh pal saath baithana na aaya,
humein ruthon ko manana na aaya….
na dostee nibhaanee aaee,
na nazaren jhuka paee,
kuchh yoon bayaan hua haal e dil ka phasaana.
humein…..
humein to aaj bhee ruthon ko manana na aaya….

 

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

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