धर्म

धर्म के आड़ में

  धर्म की आड़ में मुँह में रामनाम है, और हाथ में जाम है कहीं अल्लाह, कहीं राम, कहीं ईसा मसीह है, कहीं राम है धर्म की आड़ में क़त्ल कर रहा इंसान है कभी मज़हब तो कभी मान है अपनी बनाई रचना पर स्तब्ध है सृष्टि आज मौन है… हैरान है… भोला बचपन बीत …

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सिर्फ तू

सिर्फ तू

सिर्फ तू एक भीनी भीनी सी महक आज भी मेरे साँसों में है तेरे तसव्वुर का असर आज भी सलामत मेरे ज़ेहन में है… तड़प उठता है दिल, तुझे अक्सर तन्हाई में याद करके खामोश रहते हैं लब, ना बोले बेशक ये ज़रा लेकिन आँखों में तेरी हसरत आज भी समाए रहती है| ~०~ कहते …

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अतिथि पोस्ट: Anupama Jha, अमर कविता

अमर कविता अमर,अजेय निर्भीक, निर्भय सब कालों में व्याप्त है कोई उसका पर्याय नहीं यह स्वयं पर्याप्त है, शब्द है यह गाथा है काव्य है,यह कविता है हर युग में, हर काल में लिखा गया,कवि मन का गीत यह शब्दों की सरिता है। रौद्र कभी,वात्सल्य कभी कभी विभत्स, कभी श्रृंगार है छंदो में बहता मलय …

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आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ

आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ

-रंजीता नाथ घई आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ… आज फिर उस मोड़ पर मुड़ना हुआ  जब रखा था पहला कदम मैंने इस देहलीज़ पर….. मन में डर और एक अजीब  सी बेचैनी थी, नए थे गलियारे और नयी सी दीवारें थी,  थम सी जाती थी हँसी और कशमकश से जूझती थी, फिर दिखी …

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कुछ बिखरी यादें, कुछ बिखरे पल

कुछ बिखरी यादें, कुछ बिखरे पल

  कुछ बिखरी यादें, कुछ बिखरे पल मुट्ठी भर राख और कुछ बिखरी यादें रह जाती हैं जो रह रह कर हमें आंसुओं में भिगो जाती हैं| कागज़ की कश्ती, रेत के घरोंदे बनाते बचपन बीता, बस यादों में सिमट के रह गए मेरा बचपन के अफसाने| हर बीता लम्हा कभी ख़ुशी, कभी गम तो …

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एक सवाल

एक सवाल

एक सवाल उन्हें मस्रूफ़िअत से फुरसत नहीं हमें इंतज़ार की आदत सही गुज़र गया आज का दिन भी रोज़ की तरह ना उनको फुर्सत मिली ना ख़याल आया * बेइंतहा उन्हें चाहने की बेबसी मेरी कुछ किस्मत बुरी, तो कुछ वक्त ही बुरा सा है… याद करते नहीं, तो याद आते ही क्यूँ हो ख्यालों में …

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जीवन के परदे पर

जीवन के परदे पर

जीवन के परदे पर जीवन के परदे पर हम तुम खेल रहे हैं खेल शतरंज हो या चोर सिपाही सही गलत के फैसले का होगा सुन्दर मेल हर कदम पर लड़ना होगा हलकी सी चूक परकभ शय होगी तो कभी मौत कभी वज़ीर बन तो कभी मोहरा बन बंद होंठों से तिरछी हंसी हँसते चलेंगे …

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mann ki aarzoo मन की आरज़ू

mann ki aarzoo | मन की आरज़ू

mann ki aarzoo | मन की आरज़ू झूटी कसमें… टूटे वादे बिखरे ख्वाब, अधूरे सपने, नादान सी हसरतें, कुछ मचलती ख्वाहिशें; और फिर वही रंजिशें हैं| गुज़रे लम्हों और उम्मीदों की कश्ती पर सवार, अनंत ही तो हैं इस चंचल मन की आरज़ू… कभी रोकर तो कभी हँसकर ही सही, हर इलज़ाम हमने अपने सर …

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