Zindagi Ka Sabak | ज़िन्दगी का सबक

zindagi ka sabak ज़िन्दगी का सबक

Zindagi Ka Sabak | ज़िन्दगी का सबक

सीखा है ज़िन्दगी का सबक
कुछ इस तरह,
अपनों ने दिए जख्म और मलहम
गैर लगा रहे हैं,
ता-उम्र के वादे करके
दो पल साथ बैठने की गुजारिश भी नहीं,
किसको कहे अपना यहाँ,
जब अपने ही नजरें फेरे जा रहे हैं..!!
ढूँढेंगी नजरें जब इस काफिर को,
दूर….बहुत दूर…..पाओगे हमें,
हम तो तेरे ही दिवाने हैं,
लुट लुट के ही सही,
मगर हंस कर जिए जा रहे हैं…..

(28 नवंबर 2015)

 

जैसे जैसे हम ज़िन्दगी में आगे बढ़ते जाते हैं humein अलग अलग सबक सीखने को मिलते हैं| कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ कडवे होते हैं| पर हर एक सबक humein कुछ सिखा कर जाता है| और आगे का रास्ता भी बताता है ताकि ह्हुम अपने सबक से सबक लें और आगे वो गलती नाह दोहराएं|

 

Zindagi Ka Sabak

seekha hai zindagi ka sabak
kuchh is prakar,
apon ne diya ghaayal aur malaham
gair laga hai,
ta-umr ke vaade karake
do pal ke saath baithane kee gujaarish bhee nahin,
kisako kahe apana yahaan,
jab apanee hee najaren phere ja rahee hain .. !!
dhoondhane ke samay jab yah kafar ko,
door …. bahut door ….. paoge hamen,
ham to tere hee divaane hain,
loot loot kee hee sahee,
magar hans kar jai ja raha hai …..

(28 novembar 2015)

Jaise jaise ham zindagi mein aage badhate jaate hain humein alag alag sabak seekane ko milate hain. Kuchh achche hote hain to kuchh kadave hote hain. Par har ek sabak humein kuchh sikha kar jaata hai. Aur aage ka raasta bhee bataata hai taaki hum apane sabak se sabak len aur aage vo galatee naah doharaen.

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About the Author: Ranjeeta2018

कवितायेँ लिखना और पढना रंजीता का शौक ही नहीं पर जुनून भी है| उनकी हर कविता की प्रेरणा उन्हें ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से मिलती है| "मन की आरज़ू" उनकी कुछ कविताओं को प्रकाशित करने की पहली कोशिश थी , जो वह 1985 से आज तक लिखी गई है। इसके बाद तो मानो एक कतार सी लग गयी है किताबों की... एक बेटी, एक माँ, एक फौजी पत्नी, एक ब्लॉगर, एक ग्राफिक डिजाइनर, एक अध्यापिका और एक लेखिका के रूप में रंजित नाथ घई का जीवन एक पूर्ण चक्र आ गया है। "मेरी किस्मत ने मुझे सब कुछ दिया है और ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया है| आज अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता है क्योंकि मैं अपने जीवन के हर पल को अपने जुनून, अपने नियमों और अपनी शर्तों पर जिया है। "

2 Comments

  1. ढूँढेंगी नजरें जब इस काफिर को,
    दूर….बहुत दूर…..पाओगे हमें,
    हम तो तेरे ही दिवाने हैं,
    लुट लुट के ही सही,
    मगर हंस कर जिए जा रहे हैं…..
    bahut hi khubsurat likha hai…..umda.lekhan

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